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Rang-birange phoolon ka ek guldasta

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jalaluddinkhan


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झंडा हमारे देश का ऊंचा रहे सदा.

Posted On: 15 Aug, 2012  
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For You .

Posted On: 7 Jun, 2012  
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वही है धनवान.( माँ को समर्पित )

Posted On: 12 May, 2012  
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मेरे वतन को मोहब्बत का बाग़ रहने दे.(ग़ज़ल)

Posted On: 29 Apr, 2012  
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टी.ई.टी. धाँधली से पार पाने का रास्ता.

Posted On: 22 Apr, 2012  
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बेरोजगारी भत्ता और लूट तंत्र

Posted On: 15 Apr, 2012  
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इन्सान तो इन्सान ही है(ग़ज़ल)

Posted On: 19 Mar, 2012  
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होली के रंग

Posted On: 8 Mar, 2012  
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Posted On: 6 Mar, 2012  
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निर्वाचन प्रणाली में सुधार की दरकार अभी है.

Posted On: 5 Mar, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan

के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan

आपके तर्क आपके अंधभक्त होने की ओर ही इशारा करते हैं.यहाँ बात मोदी के हीरो होने या न होने की है,लेकिन आपका कुतर्क कहता है की मैंने क्यों नहीं इस ब्लॉग की शुरुआत कश्मीर से भगाए गए हिंदुओं से की,आपकी यह बात मिसाल है जामुन के पेड़ पर आम क्यों नहीं उगते,जैसे सवाल का.आप यह भी कहना चाहते हैं कि इतिहास में यदि गलत हुआ था,तो आज के गलत को गलत कहना सही नहीं है.मैं ऐसा नहीं सोचता.मेरा मानना है कि इतिहास गलतियों से सबक़.सीखने को कहते हैं. मैं किसी बलात्कार को इसलिए जायज़ नहीं ठहरा सकता ,क्योंकि कल हुए बलात्कार के दोषियों को सजा नहीं मिली इसलिए आज बदले में बलात्कार करने की छूट दी जाये.मैं कल के गलत को भी गलत ही मानता हूँ और आज के गलत को भी गलत मानता हूँ वैसे सुना है दूसरों के पाप गिनाने से अपने पाप कम नहीं होते,शायद आपने भी सुना हो .

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के द्वारा: चित्रकुमार गुप्ता चित्रकुमार गुप्ता

के द्वारा: Rajesh Kumar Srivastav Rajesh Kumar Srivastav

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

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के द्वारा: अकबर महफूज आलम रिजवी अकबर महफूज आलम रिजवी

के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra

दोस्त सही कहा आपने आजम खान को कहने का क्या हक है कि किसे राजनीति में दखल देना चाहिये किसे नहीं। यह किसी भी भारतीय नागरिक की व्यक्तिगत इच्छा है, और उन्हें संविधान में इसके लिये अधिकार प्राप्त है। लेकिन किसी धार्मिक व्यक्ति का धर्म के या जाति के नाम पर वोट माँगना मेरी दृष्टि में उचित नहीं है। हाँ भारत के नागरिक के रूप में कोई भी व्यक्ति राजनीति में दखल रख सकता है। जिस तरह न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के मध्य शक्ति प्रथककरण का सिद्धांत हमारी संसदीय व्यवस्था का मजबूत बनाता है, उसी तरह धर्म और राजनीति में भी यह सिद्धांत चरितार्थ होना चाहिये। इसे झुठलाना बहुत ही कठिन है कि धर्म हमारे देश को कमजोर बनाता है।     जरा सोचिये यदि सभी धर्मों के प्रमुख राजनीति में दखल देने लगेंगे तो हमारे देश का क्या होगा। उस भयावह स्थिति की कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठता हूँ। जिस तरह किसी राजनैतिज्ञ का धर्म के क्षेत्र में  कोई दखल तथा महत्व नहीं होता। उसी तरह धर्म गुरुओं को भी राजनीति से दूर रहकर धर्म का स्तर ऊँचा करना चाहिये। कृपया इसे भी पढ़े- नेता कुत्ता और वेश्या

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

जलालुद्दीन जी बहुत ही सुन्दर कविता, दोस्त मेरा तो मानना है कि जितने मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरूद्वारे आदि हैं, इनकी जगह अस्पताल, स्कूल एवं फुटपाथों पर रहने वालों के लिये घर बना दिये जायें। शायद खुदा भी यही चाहता होगा। किन्तु हम हम स्वार्थी इंसान उस खुदा, भगवान, गॉड या वाहे गुरु की बात कहाँ मानने वाले।   भाई सचमुच यह इंसान हैं लेकिन यह धर्म की शराब पीकर हम हिन्दु , मुसलमान, ईसाई  आदि बन गये। अब हमारा इंसान बनना बहुत कठिन है।   निश्चित ही ऊपर वाला हमें बनाकर आज पछता रहा होगा।    आश्चर्य, जिसने यह संसार बनाया, अहंकार एवं अज्ञान वश या उसके अहसानों से मुक्त होने हम उसके लिये रहने के लिये मंदिर-मस्जिद बनाते हैं। अरे यदि उसे कहीं रखना है तो  आपने विशाल हृदय में रखो। इससे कई समस्याओं का निदान हो जायगा। शायद हम पुनः इंसान बन जायेंगे।  कृपया इसे भी पढ़े- नेता कुत्ता और वेश्या

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अबोध जी, आपने इस बार ज़रा जल्दबाजी में मुझे पढ़ा है.मैंने उनके फतवे के बारे में कोई बात ही नहीं की.उसके समर्थन की तो बात तो बहुत दूर है.मेरा विषय था राजनीति में किसे आना चाहिए,किसे नहीं?क्या यह तय करने का काम हमारा है!वैसे यह भी कहीं नहीं लिखा कि धार्मिक व्यक्ति वोट नहीं डाल सकता या किसी के पक्ष में वोट देने की अपील नहीं कर सकता.क्या वह देश का नागरिक नहीं हैं.उन्हें देश-समाज का अच्छा-बुरा सोचने का हक नहीं है.क्या धार्मिक व्यक्ति टाट बाहर हो जाता है.यह सोच संविधान की सोच से अलग है.जहाँ तमाम धार्मिक व्यक्ति,कलाकार,नेता-अभिनेता किसी न किसी दल का खुला समर्थन कर रहें है और कुछ तो बाकायदा चुनाव भी लड़ रहे हैं तो सिर्फ इमाम बुखारी पर ही लगाम लगाना समझ से परे है.फिर भी चिंता की बात नहीं है अबोध जी,देश उबल कर जाग चुका है.किसी फतवे और अपील का पूर्व में क्या हश्र हो चुका है,आप निश्चित रूप से उससे वाकिफ होंगे.अंतिम फैसला जनता का होता है,इस बार भी वही होगा.वैसे आपकी चिंता भी गलत नहीं है.धन्यवाद.

के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan




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