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बाल दिवस पर विशेष : चलो तलाशें बचपन

Posted On: 13 Nov, 2017 कविता में

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(1)

चलो तलाशें बचपन,
उनका,
जो माता-पिता की,
उंगली पकड़ने के दिनों में,
लड़खड़ाते कदमों से,
होटलों में ,
चाय का गिलास धोते हैं,
जो नाम के लिए ,
छोटू होते हैं,
जबकि छोटे तो वे,
कभी थे ही नहीं,
कभी किसी ने,
उन्हें गोद में लेकर,
लोरी नहीं सुनाया,
सर पर किसी ने,
प्यार से हाथ नहीं फेरा,
गाली,झिडकी,लात,
भूख,प्यास और ,
थकन से टूटता बदन,
जिनकी नियति है,
एक दिन,
बस आज के दिन ही,
चलो तलाशें बचपन.
उनका.

(2)

जिनके पीठ पर,
स्कूल के बैग की जगह,
प्लास्टिक का बोरा होता है,
और जो कूड़े के ढेर पर,
कूड़े से रद्दी बीनते,
गली-मोहल्ले में,
नजर आते हैं,
और जिनको देख कर,
कुत्ते भौंकते हैं,
और जिनके ,
गन्दे शरीर को देखकर,
घिन आती है,
बिल्कुल तरस नहीं आता,
जिनपर,
एक दिन,
बस आज के दिन ही,
चलो तलाशें बचपन,
उनका.

bheekh

(3)

जो भीख मांगते,
कहीं भी नजर आ जाते हैं,
जब उन्हें ,
स्कूल जाना चाहिए,
वे अपना नन्हा हाथ फैलाए,
एक से दूसरे व्यक्ति के,
सामने खडे नजर आते हैं,
कभी पैर छूते हैं,
कभी कदमों से लिपट जाते हैं,
कभी रिरियाते हैं,
लोग डाँटते हैं,
कोई झिड़कता है,
और कोई जोर से झटक देता है,
लेकिन,
वे अपना काम नहीं छोड़ते हैं,
एक दिन,
बस आज के दिन ही,
चलो तलाशें बचपन,
उनका.



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