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युवा पहलवान जो काफी थका हुआ था, वह अंजाम समझता था

Posted On: 28 Sep, 2017 हास्य व्यंग में

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कभी शीशा,कभी पत्थर,कभी दिल  को ही दे मारा,

सितमगर मारना था जब,मुझे तो मार ही डाला।


एक पहलवान था, युवा और बेहद ताक़तवर। एक बार उस इलाक़े के राजा ने कुश्ती का आयोजन किया। कुश्ती में उस पहलवान ने भी हिस्सा लिया। राजा ने अपने एक पहलवान ‘प्रवेश परीक्षा’ को उस पहलवान के मुक़ाबले में उतारा। युवा पहलवान ने राजा के पहलवान ‘प्रवेश परीक्षा’ को चुटकी में पटक दिया।


अब वह विजेता घोषित किया जाने वाला था। तभी राजा ने कहा- अभी नहीं, तुम अभी विजेता नहीं हो। अभी तुम्हें मेरे पहलवान मुख्य परीक्षा से मुक़ाबला करके उसे भी हराना होगा। तब जाकर तुम विजेता माने जाओगे। युवा पहलवान इस पर भी राज़ी हो गया।


अब उसका मुक़ाबला मुख्य परीक्षा पहलवान से हुआ। युवा पहलवान ने कुछ संघर्ष के बाद उसे भी पटक दिया। इस प्रयास में युवा पहलवान हांफ गया था। मगर उसे इत्मीनान था कि उसने मुक़ाबला जीत लिया है और वही विजेता होगा। पर उसका यह सोचना गलत साबित हुआ।


राजा बोला- नहीं, यह जीत नहीं मानी जायेगी। अब तुम्हें मेरे टीईटी पहलवान से मुक़ाबला करके उसे हराकर यह साबित करना होगा कि वाक़ई में तुम में दम है। युवा पहलवान की साँस फूल रही थी, इसके बावजूद भी उसने इस चैलेंज को क़बूल कर लिया। टीईटी पहलवान काफी दमदार था, युवा पहलवान को उसको परास्त करने में छक्के छूट गए। मगर उसने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग करके टीईटी पहलवान को पटक ही दिया।


अब उसे पूरा विश्वास था कि वह विजयी है और उसे उसका पुरस्कार अब मिलने ही वाला है, लेकिन उसका यह विश्वास जल्द ही शीशे की तरह चकनाचूर हो गया। राजा बोला अभी नहीं। अभी तो तुम्हें मेरे लिखित परीक्षा पहलवान से मुक़ाबला करना है, तब मैं तुम्हें असली पहलवान मानूँगा।


युवा पहलवान तीन-तीन पहलवानों से मुक़ाबला करने के बाद काफी थक गया था। उसकी सांस उखड़ रही थी। वह ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसका सारा बदन दुःख रहा था, लेकिन वह जिस पुरस्कार को प्राप्त करने आया था, वह उसे नहीं मिला था। इसलिए थका होने के बाद भी वह मुक़ाबले के लिए तैयार हो गया।


उसके सामने इसके सिवा कोई और रास्ता भी नहीं था। उसने चैलेंज क़बूल कर लिया। लिखित परीक्षा पहलवान से मुक़ाबला करने को तैयार हो गया। अब उसका अंजाम क्या होना था। युवा पहलवान जो काफी थका हुआ था, वह अंजाम समझता था, पर क्या करता, राजा के सामने विवश था। उसे लड़ना था, तय हार को जीत में बदलने के लिए। अंजाम तो जनता जानती थी, राजा जानता था, नहीं वह तो यही चाहता था।



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

amitshashwat के द्वारा
September 28, 2017

बंधुवर जलालुद्दीन जी , बहुत खूब लिखा आपने . ३० – ४० सालों पूर्व पढ़ी जाने वाली राजा – प्रजा शैली में आज की बात कहके आपने जाहिर किया है की प्रक्रिया तथा नजरिया के सन्दर्भ में लब्बोलुआब वहीँ का वहीँ है.धन्यवाद .


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