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Rang-birange phoolon ka ek guldasta

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तेरा गम है.

Posted On: 8 Nov, 2013 कविता,Others में

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    tera gham

    दिल है ज़ख़्मी तो आँख पुरनम है,

    तू नहीं है मगर तेरा गम है.

    अब कहीं भी सुकूँ नहीं मिलता,

    आज दिल का अजीब मौसम है.

    ठीक है उफ़ न हम करेंगे मगर,

    कैसे कह दें के दर्दे-दिल कम है.

    ज़ख्मे-उल्फत जो भर सके यारों,

    इस जहाँ में क्या ऐसा मरहम है.

    प्यार है जुर्म इसका इल्म न था,

    ये खता है तो फिर सजा कम है.

    यूँ तो मौसम तमाम आए-गए,

    दिल में लेकिन खजां का आलम है.

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    3 प्रतिक्रिया

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    नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    sanjay kumar garg के द्वारा
    November 9, 2013

    खान साहब, बढ़िया लिखा है, ग़ालिब साहब ने लिखा है, “किताबे-माजी भी क्या चीज है यारब, छीन ले मुझसे हफीजा मेरा”

    Imam Hussain Quadri के द्वारा
    November 9, 2013

    खूबसूरत शेर और ज़ख़्मी दिल भी है अच्छा लगा कुछ तो सबक मिला बहुत खूब .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    November 8, 2013

    सही कहा आपने . सुन्दर ,बहुत खूब कभी इधर भी पधारें .


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